मैंने अपने पिता से ज़्यादा मजबूत इंसान इस धरती पर तो नहीं देखा।
उन्होंने जिस तरह से हम सबको सींचा, हमारी शिक्षा-दीक्षा को अपने आयाम तक पहुंचाया, और व्यावसायिक जीवन के हर एक पहलू में मार्गदर्शन किया, वो उन्हें एक साधारण मनुष्य होने से अलग करती है।
उन्होंने जीवन में हमेशा रिश्तों को प्राथमिकता दी, और साथ ही साथ सभी लोगों को कर्मयोगी बनने की प्रेरणा दी।
एक भी दिन जो आज मैं व्यर्थ नहीं करता, यह आदत मुझमे उनसे ही आयी है।
उन्होंने १ जीवन में जितने काम किए हैं, जो ऊंचाइयां हासिल की हैं, और वो भी सभी प्रकार की सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए, मेरे लिए वह कल्पना से भी परे है।
मेरी कोशिश बस इतनी सी है, कि मैं स्वयं को उनके चरणों की धुल के बराबर भी सार्थक कर पाऊँ। जितने लोग उन्होंने कमाएं हैं, उसके आधे भी मैं अपने साथ लेकर चल पाऊं, तो मेरे लिए वो सफलता का एक बड़ा स्तम्भ होगा।

